Saturday, 25 August 2012

कई बार सोचा है मैने...

फिर आई थी उनकी याद जैसे आ जाते हैं उदासी भरी रातों में आंखों में चमकते मोती...ये ठंडी हवा रूह को भेदती हुई...आई है फिर उनकी याद ना जाने कीतनी बार...ए सारा जहां था और थी ढ़ेर सारी तन्हाई...ना छेड़ो ये तराना...ये साज ये दर्द भरे नगमें...मुश्किल हो जाता है जीना, तुम बढ़ गए...दूर निकल गए...मैं अब भी खड़ी हूं तुम्हारा दामन थामें...कई बार कोशिशें कीं कि समझोगे तुमपर तुमने कभी खोले ही नहीं दिल के दरीचेऔर मैं ना जाने क्या क्या कहती हुई...आज भी तुम्हारे इंतजार में खड़ी हूं...कुछ दुआएं, कुछ प्रार्थनाएं यूं ही होती हैं ज़ाया होने के लिए...पड़े पड़े बेकार सड़ने के लिए...नहीं तो...कभी तो तुम मुझे मिलते यूं ही...सिर्फ मेरे लिए...

सिर्फ मेरे लिए
मेरे ख्वाबों के लिए...
ऐसा ख्वाब जहां तुम हो
मेरे साथ
मेरे होकर...
पर कहां समझा तुमने
मेरी मुस्कुराती आंखों को
...
लिखती रही हूं यूं ही तुम्हे सोचते हुए कि तुम्हारा इंतजार खत्म हो...पर तू, तेरी यादें, तेरा इंतजार खत्म नहीं होता...और मैं जीती रहती हूं सिर्फ तेरे लिए...तुझे सोचते हुए...
(यह पोस्ट एक दोस्त के लिए...)



Friday, 13 July 2012

कई बार मरी हूं मैं........

मैने कहा उनसे मरने वालेहैं हम,
उनका जवाब सुनकर कुछ सोच में पड़ गए हम,
कहने लगे बड़े आराम से वो...
मरी तो अब भी हो तुम,
कुछ २ लम्हात पहले
जब उसने तुम्हारे मैसेज का जवाब नही दिया था,
मरी तो उस वक्त भी थी जब उस से अलग होने का फैसला लिया था,
मरी तो उस वक्त भी थी जब उसको उन सीढियों पर निराश और बेहाल छोड़कर लौट आई थी,
मरी तो उस वक्त भी थी जब जुदा होकर खूब रोई थी,
मरी तो उस वक्त भी थी जब उसकी याद आई थी,
और हां मरी तो उस वक्त भी थी
जब उसने तुम्हे देखकर रूख फेर लिया था,
कितनी बार मरी हो तुम
हर लम्हात हर पल में तो बस मर ही रही हो,
जिंदा कहां हो
हां एक बात जरूर है कि बस दफनाया नही गया है तुम्हे...

Friday, 29 June 2012

आधुनिक भारत में पिछड़े हम...

परंपरा, संस्कृति, मजहब या धर्म यहां जितने भी शब्दों का उच्चारण हुआ है, क्या इनको प्रत्येक व्यक्ति के जिंदगी की सही दिशा को निर्धारित करने का मानक मान लेना चाहिए? क्या यही वह शब्द हैं जिनके बिना भारत के लोगों की जिंदगी बड़ी बिखरी बिखरी लगती है? यदि ऐसा है तब तो प्रत्येक व्यक्ति को खुश, शांत और संपन्न होना चाहिए क्योंकि प्रत्येक मजहब या धर्म शांति और संपन्नता का मार्ग प्रशस्त करता है. परंतु ऐसा है नहीं आज हर दूसरे कदम पर मिलनेवाला व्यक्ति दुखी, अशांत और क्षुब्ध है और इसी शांति और सुख को प्राप्त करने के लिए इंसान ना जाने कहां कहां और क्या क्या करता फिरता है? बाबाओं, मौलाना, यहां तक की झाड़-फूक करनेवालों के पास जाने से भी लोग परहेज नहीं करते और ऐसे में सुख-शांति पाने की बजाए और कई नई उलझनों में फंस जाते हैं.

इन बातों को यहां लिखने का तात्पर्य धर्म या मजहब पर उंगली उठाना नहीं है बल्की विकास की राह पर चल रहे भारत के पिछड़ेपन को केंद्रबिंदु में लाना है. आज हमको यह कहते हुए बड़ा फ़ख्र महसूस होता है कि हम विकास की राह पर अग्रसर हैं, हमारी सोच बड़ी आधुनिक होती जा रही है. पर क्या कभी यह भी सोचने का कष्ट हमने उठाया है कि २१वीं सदी में भी भारत के पति पत्नियों पर हाथ उठाने को मर्दानगी का एक लक्षण मानते हैं. भारतीय समाज में बलात्कार या शारिरिक उत्पीड़न के मामलों में आज भी औरत को ही दोषी करार दिया जाता है और जो पुरूष ऐसा कूकर्म करते हैं वह बड़ी आसानी से साफ साफ बच जाते हैं. आज भी अंतर जातीय विवाह को एक पाप माना जाता है. इस मार्डन भारत में दो व्यक्ति जो वयस्क और जिम्मेदार हैं वह अपनी मर्जी से अपना जीवनसाथी नही चुन सकते. आधुनिक होने की माला जपते जपते हम अपने ही अंदर छुपे दूसरे चेहरे को पहचान नही पा रहे हैं. पिछले कई सालों से शिक्षा के क्षेत्र में अग्रणी रहने पर भी लड़कियों के लिए यह सुनना की आखिर करना तो चुल्हा चौका ही है कोई अचरज की बात नही है. हमारे ही समाज के एलीट क्लास में हो रही कन्या भ्रूण हत्या हमें भारत के किस विकास के चेहरे से परिचित करनावा चाहती है?यह समझना काफी मुश्किल है.  

हम खुद को आधुनिक कहने में एक पल भी संकोच नही करते परंतु यह आधुनिकता मार्डन कपड़ों तक ही सीमित हो गई है अभी पूरी तरह विचारों तक नहीं पहुंची. जिन्होने आधुनिकता पर अपनी नई सोच बनाई है उनका इसी संस्कृति प्रधान देश में काफी विरोध किया जाता है. साथ ही यह कहना भी अतिश्योक्ति नही होगी कि समाज में बाहर आकर आधुनिकता और विकास पर बड़े बड़े भाषण देनेवाले लोग अपने ही घर में इन शब्दों की परिभाषा बदल देते हैं. आज हमें दोहरी जिंदगी जीने की आदत सी पड़ गई है, अपने लिए कुछ और, लोगों के लिए कुछ और. एक ही पहलू को हम दो चश्में से देखने लगे हैं. आज हमें खुद को आधुनिक और मार्डन साबित करना पड़ता है छोटे कपड़े पहनकर और सेक्स जैसे शब्दों को खुले आम लेकर. आज भी सलवार-कमीज या बुर्का पहननेवाली लड़की बहनजी”  या आपा ही है, भले ही उसके विचार कितने ही आधुनिक क्यों ना हो. यह सब देखते हुए हमें एक बार फिर सोचना होगा की क्या यही है हमारा विकसित भारत? क्या इसी भारत के सपने हम देख रहे हैं?            


Thursday, 10 May 2012

कहने को थीं जो बातें...



 
बीते हुए दिनों का अंधेरा, बेचैनिया, दर्द वर्तमान समय की खुशियों को मुकम्मल नहीं होने देता और ऐसे में क्या बात जब बीता कल बार बार यादों के दरवाज़े पर आकर खड़ा हो जाए. नहीं, नहीं जानती क्युं खुद ही अपने हाथों से ज़ंजीरें बांध रखीं हैं पैरों में...खुशियों से वाबस्ता तो मेरा भी है...मैं भी उड़ना चाहती हूं, नापना चाहती हूं आकाश की उचाईंयों को...फिर क्यों यह मन बांध देता है मुझे कई हदों में, कई उलझनों में...कितना अच्छा हो जो हमें भी भूलने की आदत सी पड़ जाए...वो लम्हात जो दर्द देते हैं, टीस पैदा करते हैं...

कई बार बंद की वो किताब जिसमें थे हम...पर खुल ही जाते हैं पन्ने ना जाने कैसी हड़बड़ाहट में...आमना सामना हो ही जाता है उन लम्हों से जो बिताए थे कभी साथ-साथ...पर उन लम्हों को याद भर किया जा सकता है छुआ या पाया नहीं जा सकता...पर उन लम्हातों को याद करने से भी क्या फायदा...हासिल कुछ नहीं होगा...बस खलिश रह जाएगी...अनंत तक...

तुम भी कहां सुकून से होगे?...जानती हूं कि तुम्हारी झल्लाहट, उस अजनबीपन ने तुम्हे भी परेशान किया होगा...तुम्हारा हसना, किताबों में खो जाना सुकून देता होगा तुम्हे पर वो भी कुछ लम्हों के लिए ही क्योंकि जानते तुम भी हो कि मन को बहुत देर तक बंद दरीचों में नहीं रखा जा सकता..खैर उन लम्हात को आंसुओं से भिगोने पर भी हासिल क्या, कुछ नहीं है...
कहनें को थीं जो बातें...कहां कह पाई...वापस नहीं चाहती करना याद...तुम्हें ना तुम्हारी यादों को...पर फिर सोचती हूं कि कभी जो फिर मुलाकात हुई तो क्या इतनी देर से जो गुस्सा तुम पर आ रहा है, वह कायम रह पाएगा...जो दर्द दिल महसूस कर रहा है वो साबुत रह पाएगा...पर दुआ यही है कि फिर मुलाकात ना हो कभी किसी मोड़ पर तुमसे...पड़े रहें वो सपने टूटे, आसू बिखरे रहे...गुस्सा उफनता रहे...तब कहीं जाकर बंद होंगे दरीचे मन के... 

फिर भी कहीं तुमको सुख मिल रहा होगा तो कुछ बुंदें हमें भी देना...क्योंकि आज भी जीने का सलीका नहीं आया हमें...
  


Monday, 30 April 2012

तुम...


इस भागदौड़ में सबकुछ भूल जाते हैं...
नहीं भूलते अगर कुछ,
तो तुम्हे भूलना नहीं भूलते हैं...
दिन तो बड़ी उलझन में कट जाता है
बीत जाती है शाम भी तुम्हारे बिना
पर रात में तुम्हें सोचना नहीं भूलते हैं...
हर पल लगता है,
कुछ नहीं हो तुम हमारे...
पर हर पल तुम्हें अपना कहना नहीं भूलते हैं...
बड़ा दर्द देते हो तुम,
चोटें  भी पहुचाती हैं तुम्हारी यादें,
पर क्या करे, तुम्हे चाहना नहीं भूलते हैं..

Saturday, 31 March 2012

तेरे इश्क में...

तेरे इश्क में डूबती जा रही हूं
चाह कर तुझे खुद को भूलती जा रही हूं,
तुझे पाना मेरा ख्वाब नहीं
पर ख्वाबों में सिर्फ तुझे ही देखती जा रही हूं,
जानती हूं मैं तू मेरा मुकद्दर नहीं
पर फिर भी तेरे इंतज़ार में बेकरार होती जा रही हूं,
ये क्या हुआ है मेरे दिल तुझे
क्यूं किसी के ख्यालों में खोती जा रही हूं,
कभी बेचैनी, कभी बेबसी, आंखो में है आंसु कभी
पर फिर भी तुझे ही याद करती जा रही हूं...