कई बार दिल ने चाहा कि कह दें क्या चल रहा है दिलो दिमाग में...अपनी लड़खड़ाती. सँभलती सोच को आज समझा है मैने...महसूस भी किया है अपनी कशमकश को...पर होठों पर जो सहमे से लफ्ज़ है...खुद को कह देने में कहाँ मोतबर हैं...खलिश भी है, एक बंदिश भी...और खुद की खुद से रंजिश भी...सलीका नहीं मुझे अपने जज़्बातों को कहने का...मलाल भी होता है यू़ खामोश रहने का...समझ तो गई हूँ कि क्या कहना चाहती हूँ पर अब भी लगता है...सरोकार नहीं जो कहना है...शायद मुझे अपने इसी खोल में रहना है...तुम्हारा अक्स उभरता है और फिर धूंधला हो जाता है...समझ नही सकती की कौन से लम्हे किस पर भारी हैं...तुम्हारे साथ बिताए खुशियों के या याद में तुम्हारे पल पल तड़पने के...ऐसा लगता है कभी कभी...तुमको चाहती हूँ याद करना तो याद करती हूँ...पर अपनी डायरी को जब देखती हूँ तो बेइख्तियारी में लिखे तुम्हारे नाम को पढ़कर सोचती हूँ... आ जाते हो सोचों में जब आना चाहते हो... पल पल साथ रहते हो… मेरा इख्तियार नहीं रहता अपनी इस कैफियत पर...मेरा बस नही चलता अब खुद पर...इतना भी नहीं कि तुम्हे खुद से और अपनी सोचों से दूर कर सकूँ...तुम्हें सोचे बिना एक पल जी सकूँ...शायद मेरी इस बेबसी पर तुम्हे हँसी आ रही होगी...पर जान लो...खुश मैं भी हूँ यूँ बेबस होकर...तुम्हारी याद में हारकर...अच्छा लगता हैं युंही तुम्हे सोचते हुए...तुम्हारे साथ युंही बहते हुए...
Saturday, 25 February 2012
मेरी लड़खड़ाती सँभलती सोच…
कई बार दिल ने चाहा कि कह दें क्या चल रहा है दिलो दिमाग में...अपनी लड़खड़ाती. सँभलती सोच को आज समझा है मैने...महसूस भी किया है अपनी कशमकश को...पर होठों पर जो सहमे से लफ्ज़ है...खुद को कह देने में कहाँ मोतबर हैं...खलिश भी है, एक बंदिश भी...और खुद की खुद से रंजिश भी...सलीका नहीं मुझे अपने जज़्बातों को कहने का...मलाल भी होता है यू़ खामोश रहने का...समझ तो गई हूँ कि क्या कहना चाहती हूँ पर अब भी लगता है...सरोकार नहीं जो कहना है...शायद मुझे अपने इसी खोल में रहना है...तुम्हारा अक्स उभरता है और फिर धूंधला हो जाता है...समझ नही सकती की कौन से लम्हे किस पर भारी हैं...तुम्हारे साथ बिताए खुशियों के या याद में तुम्हारे पल पल तड़पने के...ऐसा लगता है कभी कभी...तुमको चाहती हूँ याद करना तो याद करती हूँ...पर अपनी डायरी को जब देखती हूँ तो बेइख्तियारी में लिखे तुम्हारे नाम को पढ़कर सोचती हूँ... आ जाते हो सोचों में जब आना चाहते हो... पल पल साथ रहते हो… मेरा इख्तियार नहीं रहता अपनी इस कैफियत पर...मेरा बस नही चलता अब खुद पर...इतना भी नहीं कि तुम्हे खुद से और अपनी सोचों से दूर कर सकूँ...तुम्हें सोचे बिना एक पल जी सकूँ...शायद मेरी इस बेबसी पर तुम्हे हँसी आ रही होगी...पर जान लो...खुश मैं भी हूँ यूँ बेबस होकर...तुम्हारी याद में हारकर...अच्छा लगता हैं युंही तुम्हे सोचते हुए...तुम्हारे साथ युंही बहते हुए...
Friday, 17 February 2012
चलो एक बार फिर से...
तुम आए
और चले गए, एक बार पलट कर देखा भी नही कि मेरी नज़रें कुछ पूछ रहीं हैं तुमसे. कुछ
सवाल करना चाहती हैं, कुछ सुनना चाहती हैं तुमसे. पर
तुम्हारी वो अजनबियत ना जाने कितना कुछ कह गई बिना कुछ कहे. मैं बस देखती रही,
सोचती रही कि तुम वही हो या फिर कुछ जताना चाहते हो. कुछ एहसास, कुछ गलतियाँ बताना चाहते हो. ज़हन में यह भी उभरते रहा कि क्युं सोच रही
हूँ तुम्हे. क्युं परवाह कर रही हूँ, क्युं फर्क पड़ रहा है
मुझे, इस अंदाज से तुम्हारे. पर फर्क तो पड़ता है, मेरे लाख इंकार करने से क्या हो सकता है? लाख चाहने
के बावजूद भी की भूल जाऊँ तुम्हे. तुम ही तुम हो सोच में, ज़हन
में. कई बार तुम जब चले जाते हो मुझसे रुख फेर कर. मन तो करता है तुम्हारे पिछे
जाऊँ, तुमसे पुछूँ, क्युं करते हो ऐसा?
क्या मिलता है तुम्हे, मुझे रुला के? मुझे तड़पा के? पर ये भी जानती हूँ कोई हक नहीं रहा
है अब मुझे ऐसा करने का. फिर ये भी याद आता है कि नाराज़गी है मेरी तुमसे, तुम्हारी मुझसे या फिर दोनों की खुद से. फिर कभी कभी यूँ भी होता है कि
कहना बहुत कुछ होता है पर कभी तुम्हारी तो कभी अपनी हदों की सोचती हूँ. पर मन के
किसी कोने में ये भी उम्मीद, ये भी आस रहती है कि देखोगे कभी
तो पलट कर तुम..मेरे चेहरे पर खिले हुए मुस्कान को छोड़ कभी तो मेरी आँखों में
तैरते हुए दर्द को पहचानोगे तुम. कभी तो, कभी तो समझोगे या
फिर तुम भी जानते हो पर जताना नही चाहते?
Tuesday, 11 October 2011
बचपन
कितना हसीं था वो बचपन
हर चीज़ कितनी प्यारी थी
हर चीज़ कितनी प्यारी थी
सबको मासूम लगती थी
मां की बड़ी दुलारी थी
छल, कपट, हसद, जलन
क्या होती है बला
इल्म ही नहीं था इसका
दुनिया बड़ी सुन्दर,बड़ी हसीन नज़र आती थी
अनजान थी दुनिया से
सब लोग भले लगते थे
संग कितनी नादानी थी
हर तरफ रंग थे
खुशियों की बरसात में मन झूमता था
हर चीज़ मन के मुताबिक़ थी
वो हँसना, वो मुस्कुराना
भरी दोपहर में सहेलियों के साथ खेलने निकल जाना
तब हवाएं भी गुदगुदाती थी
न थी किसी चीज़ की फ़िक्र
न दुनिया का झमेला था
साथ था कुछ तो बस वो नानी की कहानी थी
न आंसू थे, न दर्द थे
न सोचो का ये कारवा था
दिल को हर चीज़ बड़ी आसानी से भा जाती थी
वो बचपन की यादें, सुन्दर तस्वीर सी यादें
रोती आँखों को भी हसा जाती है और
हर पल ये कहती है
कितना हसीन था वो बचपन
हर चीज़ कितनी प्यारी थी
हज़ारो जज़्बात...
हज़ारो जज़्बात थे मेरे दिल में
हज़ारो ऐसी बातें जो दिल ने
चाहा था आपसे बाटूँ, आपको
बताऊँ, पर कभी आपके मिजाज
बदले हुए लगे, तो कभी हम आपसे
खफा हो गए. ज़िन्दगी जिस रफ़्तार
से बढती रही, उसी रफ़्तार से मेरे
जज़्बात भी बदलते रहे, उम्मीद का
दामन छूटने लगा. महसूस हुआ
की कितने नादाँ थे हम जो
अपनी हर ख़ुशी आपसे जोड़ते रहे
सोचा मेरे हर ख़ुशी, हर गम
हर हालात में आप मेरा साथ देंगे
एक दोस्त की तरह, एक भाई की
तरह. पर हर पल हमें ए एहसास
होता रहा की मेरे उम्मीदों का
घरौंदा ढह जाने के लिए है और
आपको यह इख्तियार है की मेरे
मेरे हर उम्मीद को आप तोड़ दें
पर फिर क्यूँ आप हमें
भरमा रहे हैं, क्यूँ फिर नादाँ दिल को
ये समझा रहे हैं
की आप हो मेरे हर ख़ुशी
हर गम में. आप क्यूँ ये
सोचो का महल खड़ा कर रहे हो
मेरे सोचो को फिर
गलत साबित कर रहे हो
ऐसा क्यूँ होता है की मेरी
हर उम्मीद, हर सोच हर
मोड़ पर ख़तम हो जाती है
गलत साबित हो जाती है
एक लंबा सफ़र तय करने के बाद
हाथ सिर्फ इतना लगता है
की मेरी सोच कभी मेरा
साथ नहीं देती
तो कभी मेरा साथ
सोचो को गुमराह कर देती है
हर वक़्त साथ एक सवाल ,एक सोच रहती है...
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